जिसको भी देखो वही पत्रकार हो गए लिखना भले न आये ब्यूरो यार हो गए।

जिसको भी देखो वही पत्रकार हो गए
लिखना भले न आये ब्यूरो यार हो गए।

न बोलने का सेन्स न लिखना ही जानते
बैनर के तले फिर भी कलमकार हो गए।

खबरों का इंट्रो तक लिखना नहीं आता
गैरों की खबर लेकर खबरदार हो गए।

आती है हंसी मुझको ऐसे संपादकों पर
जिनकी वजह से पतझड़ भी गुलजार हो गए।

 अब अच्छे पत्रकारों का ज़माना कहाँ है
चारों तरफ ही इन्ही के अब बाजार हो गए।

 पत्रकारिता का आलम बद से हुआ बद्त्तर
  हर गली मे ये शख्स अब दो चार हो गए।

       …✍✍ एन.के मौर्य की कलम से

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