पापी पेट के लिए तमाम गमो को सहकर यहाँ मर मर कर जी रहे हैं मछुआरे !

विकास की योजनाओं से दूर रहकर फूस के आशियाने मे ये भर रहे दर्द की आह


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नवल पाण्डेय 

IA2Z गोण्डा- पापी पेट के लिए तमाम गमो को सहकर अपने साथ साथ परिजनो का निर्वाह करने वाले  मछुआरों के लिए विकास की सारी योजनाएं बेईमानी साबित हो रही हैं, न एक जून की रोटी और न ही रोजगार की व्यवस्था, दिलो में दर्द का तूफ़ान,आँखों में गम के आंसू लेकर ये किस तरीके से जी रहे हैं किसी को कोई खबर नहीं, बरसात मे टपकते पानी का सामना व तपती गर्मी मे फूस के आशियाने मे आग लगने का डर, बस यही है इनकी दुःख भरी जिंदगी, जहाँ सिर्फ गम ही गम है, इसके अलावा यहाँ कुछ भी नही है।

हम बात करते हैं गोण्डा तरबगंज विकास खंड के सेझिया टपरा गांव के मछुआ समुदाय के लोगों की, यहाँ के बद्री निषाद का कहना है कि लोगों ने प्रधानमंत्री आवास के लिए आवेदन किया था। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। आजादी के सत्तर साल बीतने के बाद भी विकास योजनाओं की किरण गांव तक नहीं पहुँची लोग आज भी फूस की टपकती छत के नीचे रहने को मजबूर हैं। गांव के श्रीकांत, मोहन, हरीराम, निर्मल, ननकू, राम केवल, बेचू सहित सैकड़ों लोगों ने बताया कि गांव में अभी तक कोई विकास नहीं हुआ है। पक्की सड़क कागजों पर बनी तो जरूर है लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं है। गांव सरकारी संसाधनों से कोसों दूर है। रोजगार के भी लाले हैं।

काश्तकारों के घर जी हजूरी करनी पड़ती है, कभी कभी तो काम की किल्लत पड़ जाती है। गांव छोड़कर शहरों की ओर लोगों को पलायन करना पड़ता है। पुस्तैनी चले आ रहे मछली पकड़ने का व्यवसाय भी तालाबों व नदियों के सूखने से बंद चल रहा है।

ख़ास दुश्वारियां

गांव से कोसों दूरी पर सरकारी स्कूल होने के कारण बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। बच्चे गांव से दूर पढने जाने में कतराते हैं। कागज मे बनी पक्की सड़क, धरातल पर गड्ढे, बाजार से गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को जहमत उठानी पड़ती है। गांव पहुंचने के लिए ठीक से ठीक से खडंजे तक नहीं हैं। गांव के श्रीकांत ने बताया कि सड़क गड्ढों से भरी पड़ी है। गांव के लोगों ने सरकारी संसाधनों की पूर्ति कराये जाने की मांग प्रशासन से की है, काश यहाँ भी शासन प्रशासन की नजरें निगेबान होती जहाँ पापी पेट के लिए आये दिन मछुआरे मर मर कर जी रहे हैं

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